पञ्चाङ्
पवित्र पञ्चाङ्ग • Sacred Calendar

Panchang

The Divine Hindu Calendar of Sacred Time

The Panchang is the sacred Hindu almanac guiding devotees through auspicious tithis, nakshatras, yogas, and festivals – aligning daily life with the cosmic rhythms of Sanatan Dharma.

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वैदिक काल गणना • HINDU VEDIC PANCHANG

पंचांग एवं काल गणना

भारतीय काल गणना की वैदिक परंपरा — संवत्सर, मास, तिथियाँ, नक्षत्र और शुभ-अशुभ मुहूर्त का संपूर्ण विवरण।

(Vedic Astronomy & Sacred Calendar)

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मास ०१ Spring • वसंत

चैत्र (Chaitra)

पहला मास, वसंत ऋतु का आगमन। चैत्र नवरात्रि और राम नवमी इसी मास में मनाई जाती है।

मास ०२ Summer • ग्रीष्म

वैशाख (Vaishakha)

ग्रीष्म ऋतु का प्रारंभ। अक्षय तृतीया इसी मास की प्रमुख व परम शुभ तिथि है।

मास ०३ Summer • ग्रीष्म

ज्येष्ठ (Jyeshtha)

वर्ष का सबसे गर्म मास। गंगा दशहरा और निर्जला एकादशी इसी मास में आती है।

मास ०४ Monsoon • वर्षा

आषाढ़ (Ashadha)

वर्षा ऋतु का आरंभ। गुरु पूर्णिमा के साथ पावन चातुर्मास का शुभारंभ होता है।

मास ०५ Monsoon • वर्षा

श्रावण (Shravana)

भगवान शिव को समर्पित पवित्र मास। कांवड़ यात्रा और रक्षाबंधन इसी मास में मनाए जाते हैं।

मास ०६ Monsoon • वर्षा

भाद्रपद (Bhadrapada)

श्री कृष्ण जन्माष्टमी और दस दिवसीय गणेश चतुर्थी महाउत्सव इसी मास में मनाए जाते हैं।

मास ०७ Autumn • शरद

आश्विन (Ashwin)

शरद ऋतु का आगमन। शारदीय नवरात्रि, दुर्गा पूजा और विजयादशमी इसी मास में मनाए जाते हैं।

मास ०८ Autumn • शरद

कार्तिक (Kartika)

सर्वाधिक पुण्यदायी मास। दीपोत्सव, दीपावली, गोवर्धन पूजा और तुलसी विवाह इसी मास में मनाए जाते हैं।

मास ०९ Pre-Winter • हेमंत

मार्गशीर्ष (Margashirsha)

भगवान श्री कृष्ण को अति प्रिय मास ('मासानां मार्गशीर्षोऽहम्')। विवाह पंचमी इसी मास में मनाई जाती है।

मास १० Winter • हेमंत

पौष (Pausha)

शीत ऋतु का मास, प्रत्यक्ष सूर्य देव को समर्पित। इसके अंत में मकर संक्रांति का महापर्व आता है।

मास ११ Late Winter • शिशिर

माघ (Magha)

पवित्र त्रिवेणी स्नान का मास। वसंत पंचमी, गुप्त नवरात्रि और माघ मेला इसी मास में मनाए जाते हैं।

मास १२ Spring • शिशिर

फाल्गुन (Phalguna)

संवत वर्ष का अंतिम मास। महाशिवरात्रि की पावन रात्रि और रंगों का महाउत्सव होली इसी मास में संपन्न होता है।

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प्रथम अंग

तिथि (Tithi)

चंद्र दिवस — सूर्य और चंद्रमा के बीच के १२° कोणीय अंतर पर आधारित। प्रत्येक पक्ष में १५ तिथियाँ होती हैं — प्रतिपदा से पूर्णिमा/अमावस्या तक।

३० कुल तिथियाँ
द्वितीय अंग

वार (Vara)

सप्ताह का सौर दिन — सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक की अवधि। रवि से शनि तक सात वार होते हैं जिनका अधिपति संबंधित ग्रह होता है।

७ वार
तृतीय अंग

नक्षत्र (Nakshatra)

चंद्रमा का तारा समूह — क्रांतिवृत्त का १३°२०' का भाग जिसमें चंद्रमा भ्रमण करता है। कुल २७ मुख्य नक्षत्र एवं १ अभिजित नक्षत्र होते हैं।

२७ नक्षत्र
चतुर्थ अंग

योग (Yoga)

सूर्य और चंद्रमा के भोगांशों का योग (१३°२०' प्रति योग)। कुल २७ योग होते हैं जो शुभ व अशुभ कर्मों के चयन हेतु विचारणीय हैं।

२७ योग
पंचम अंग

करण (Karana)

तिथि का अर्ध भाग (६° का कोणीय अंतर)। एक तिथि में दो करण होते हैं। कुल ११ करण — ७ चर और ४ स्थिर होते हैं।

११ करण
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१. नंदा तिथि

प्रतिपदा (Pratipada)

प्रथम तिथि — स्वामी अग्नि देव। नवीन उत्सव, दीक्षा व मांगलिक कर्मों का आरंभ।

२. भद्रा तिथि

द्वितीया (Dwitiya)

द्वितीय तिथि — स्वामी ब्रह्मा जी। यात्रा, शिलान्यास एवं स्थायी कर्म हेतु शुभ।

३. जया तिथि

तृतीया (Tritiya)

तृतीय तिथि — स्वामी गौरी माता। अक्षय फल प्रदाता, विवाह एवं सौभाग्य कार्य।

४. रिक्ता तिथि

चतुर्थी (Chaturthi)

चतुर्थ तिथि — स्वामी श्री गणेश। विघ्न हरण, संकट मोचन एवं शत्रु शमन कर्म।

५. पूर्णा तिथि

पञ्चमी (Panchami)

पंचम तिथि — स्वामी नाग देवता। विद्यारंभ, औषध निर्माण व शुभ संस्कार।

६. नंदा तिथि

षष्ठी (Shashthi)

षष्ठ तिथि — स्वामी कार्तिकेय। यश, विजय, कांति व युद्ध विद्या अभ्यास।

७. भद्रा तिथि

सप्तमी (Saptami)

सप्तम तिथि — स्वामी सूर्य नारायण। यात्रा, वाहन क्रय एवं स्वास्थ्य लाभ।

८. जया तिथि

अष्टमी (Ashtami)

अष्टम तिथि — स्वामी भगवान शिव व दुर्गा। शक्ति उपासना, उपवास व व्रत।

९. रिक्ता तिथि

नवमी (Navami)

नवम तिथि — स्वामी दुर्गा माता व श्रीराम। पराक्रम, विजय व शस्त्र साधना।

१०. पूर्णा तिथि

दशमी (Dashami)

दशम तिथि — स्वामी यमराज व धर्म। धर्म कर्म, सत्य आचरण व विजय यात्रा।

११. नंदा तिथि

एकादशी (Ekadashi)

एकादश तिथि — स्वामी श्री हरि विष्णु। महाव्रत, उपवास, मोक्ष व भक्ति संवर्धन।

१२. भद्रा तिथि

द्वादशी (Dwadashi)

द्वादश तिथि — स्वामी विष्णु। पारण, दान, यज्ञ-हवन व ब्राह्मण सेवा।

१३. जया तिथि

त्रयोदशी (Trayodashi)

त्रयोदश तिथि — स्वामी कामदेव। प्रदोष व्रत, मित्रता, प्रेम व आरोग्य।

१४. रिक्ता तिथि

चतुर्दशी (Chaturdashi)

चतुर्दशी तिथि — स्वामी भगवान शिव। मासिक शिवरात्रि, रुद्रार्चन व आत्मशोधन।

१५. पूर्णा तिथि

पूर्णिमा / अमावस्या

पूर्णिमा (स्वामी चंद्र - प्रकाश) / अमावस्या (स्वामी पितृ - आत्मनिवेदन)।

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रविवार (Ravivara)

Sunday

सूर्य देव को समर्पित दिन। आरोग्य, तेजस्विता, नेत्र रक्षा और राजकार्य हेतु श्रेष्ठ।

सोमवार (Somavara)

Monday

चंद्र देव व देवाधिदेव महादेव को समर्पित। मानसिक शांति और भक्ति अनुष्ठान का दिन।

मंगलवार (Mangalavara)

Tuesday

मंगल ग्रह व श्री हनुमान जी को समर्पित दिन। साहस, पराक्रम व संकट निवारण का दिन।

बुधवार (Budhavara)

Wednesday

बुध ग्रह व प्रथम पूज्य गणेश जी को समर्पित। बुद्धि, व्यापार, वाणिज्य व लेखन हेतु शुभ।

गुरुवार (Guruvara)

Thursday

देवगुरु बृहस्पति व भगवान श्री हरि विष्णु को समर्पित। ज्ञान, दर्शन, दीक्षा और धर्म कार्य।

शुक्रवार (Shukravara)

Friday

शुक्र ग्रह व जगन्माता महालक्ष्मी को समर्पित। वैभव, कला, सौंदर्य, संगीत व समृद्धि हेतु।

शनिवार (Shanivara)

Saturday

न्यायाधीश शनि देव को समर्पित दिन। कर्म फल, वैराग्य, साधना, दान एवं सेवा का दिन।

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०१

अश्विनी (Ashwini)

देवता: अश्विनी कुमार

शीघ्रता, उपचार और नई शुरुआत का नक्षत्र।

०२

भरणी (Bharani)

देवता: यम

जन्म, मृत्यु और परिवर्तन से जुड़ा नक्षत्र।

०३ • शुभ

कृत्तिका (Krittika)

देवता: अग्नि

तीक्ष्णता और शुद्धि का नक्षत्र; श्रीराम का जन्म नक्षत्र।

०४

रोहिणी (Rohini)

देवता: ब्रह्मा

सौंदर्य, समृद्धि और प्रजनन का शुभ नक्षत्र।

०५

मृगशिरा (Mrigashira)

देवता: चंद्रमा

खोज, कोमलता और सौम्यता का नक्षत्र।

०६

आर्द्रा (Ardra)

देवता: रुद्र

तूफान, परिवर्तन और ऊर्जा का नक्षत्र।

०७ • श्रीराम नक्षत्र

पुनर्वसु (Punarvasu)

देवता: अदिति

नवीनीकरण, घर वापसी और पुनः आशा का नक्षत्र।

०८ • नक्षत्र राज

पुष्य (Pushya)

देवता: बृहस्पति

सर्वश्रेष्ठ नक्षत्र — पोषण, भक्ति और शुभता का प्रतीक।

०९

आश्लेषा (Ashlesha)

देवता: सर्प

गहरी अंतर्दृष्टि, रहस्य और कुंडलिनी शक्ति का नक्षत्र।

१०

मघा (Magha)

देवता: पितर

पूर्वजों की स्मृति, राजसत्ता और परंपरा का नक्षत्र।

११

पूर्वा फाल्गुनी (Purva Phalguni)

देवता: भग

विश्राम, आनंद और दांपत्य सुख का नक्षत्र।

१२

उत्तरा फाल्गुनी (Uttara Phalguni)

देवता: आर्यमन

मित्रता, विवाह और सामाजिक संबंधों का नक्षत्र।

१३

हस्त (Hasta)

देवता: सवितृ

कौशल, हस्तकला और उत्तम कार्यसिद्धि का नक्षत्र।

१४

चित्रा (Chitra)

देवता: विश्वकर्मा

सृजनशीलता, सौंदर्य और वास्तुकला का नक्षत्र।

१५

स्वाति (Swati)

देवता: वायु

स्वतंत्रता, लचीलापन और व्यापार का नक्षत्र।

१६

विशाखा (Vishakha)

देवता: इंद्र-अग्नि

लक्ष्यसिद्धि, दृढ़ता और विजय का नक्षत्र।

१७

अनुराधा (Anuradha)

देवता: मित्र

भक्ति, मित्रता और सहयोग का नक्षत्र।

१८

ज्येष्ठा (Jyeshtha)

देवता: इंद्र

वरिष्ठता, साहस और नेतृत्व का नक्षत्र।

१९

मूल (Mula)

देवता: निर्ऋति

जड़ों तक जाने, सत्य की खोज और मूल-शोध का नक्षत्र।

२०

पूर्वाषाढ़ा (Purva Ashadha)

देवता: आप (जल)

अजेयता, शुद्धि और प्रारंभिक विजय का नक्षत्र।

२१

उत्तराषाढ़ा (Uttara Ashadha)

देवता: विश्वेदेव

अंतिम विजय, सत्य और धर्म की स्थापना का नक्षत्र।

२२

श्रवण (Shravana)

देवता: विष्णु

श्रवण, सीखने और ज्ञान-प्राप्ति का पवित्र नक्षत्र।

२३

धनिष्ठा (Dhanishtha)

देवता: अष्टवसु

समृद्धि, संगीत और सामूहिक ऊर्जा का नक्षत्र।

२४

शतभिषा (Shatabhisha)

देवता: वरुण

उपचार, रहस्य और आत्मनिर्भरता का नक्षत्र।

२५

पूर्वाभाद्रपदा (Purva Bhadrapada)

देवता: अजैकपाद

तीव्रता, तपस्या और आंतरिक परिवर्तन का नक्षत्र।

२६

उत्तराभाद्रपदा (Uttara Bhadrapada)

देवता: अहिरबुध्न्य

गहराई, ध्यान और आध्यात्मिक ज्ञान का नक्षत्र।

२७

रेवती (Revati)

देवता: पूषन

यात्रा का समापन, पोषण और मोक्ष का अंतिम नक्षत्र।

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०१ अशुभ

विष्कम्भ (Vishkambha)

बाधा व अवरोध उत्पन्न करने वाला योग। शुभ कार्यों में त्यागनीय।

०२ शुभ

प्रीति (Priti)

परस्पर स्नेह, प्रेम व मैत्री भाव बढ़ाने वाला आनंददायक योग।

०३ शुभ

आयुष्मान् (Ayushman)

दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और चिरस्थायी कार्य सिद्ध करने वाला।

०४ अत्यंत शुभ

सौभाग्य (Saubhagya)

वैवाहिक सुख, अखंड सौभाग्य और समृद्धि प्रदायक योग।

०५ शुभ

शोभन (Shobhana)

सुंदरता, प्रतिष्ठा और शुभ संस्कारों हेतु अत्यंत फलदायी।

०६ अशुभ

अतिगण्ड (Atiganda)

कठिनाई व संकटकारक। इसमें मांगलिक कार्य वर्जित होते हैं।

०७ शुभ

सुकर्मा (Sukarma)

सत्कर्म, सेवा, व्यापार आरंभ व सफलता का द्योतक।

०८ शुभ

धृति (Dhriti)

धैर्य, स्थिरता और भूमि-गृह प्रवेश के लिए अनुकूल।

०९ अशुभ

शूल (Shula)

पीड़ादायक एवं कष्टप्रद। शुभ कार्यों से सर्वथा दूर रहें।

१० अशुभ

गण्ड (Ganda)

विपत्ति कारक योग। शांति कर्म एवं आराधना आवश्यक।

११ शुभ

वृद्धि (Vriddhi)

धन, यश, प्रतिष्ठा और संपत्ति में उत्तरोत्तर संवर्धन।

१२ शुभ

ध्रुव (Dhruva)

अटल व स्थायी कार्यों हेतु सर्वोत्कृष्ट — नींव रखना, शिलान्यास।

१३ अशुभ

व्याघात (Vyaghata)

हिंसा व आघात का कारक। सावधानी व धैर्य अपेक्षित।

१४ शुभ

हर्षण (Harshana)

हर्ष, उल्लास, उत्सव और मनोकामना पूर्ति का योग।

१५ अशुभ

वज्र (Vajra)

कठोरता और वज्रपात समान आघात का भय। शुभ कर्म त्याज्य।

१६ अत्यंत शुभ

सिद्धि (Siddhi)

सर्वकार्य सिद्धि, तंत्र-मंत्र साधना व सफलता प्रदाता।

१७ अशुभ

व्यतीपात (Vyatipata)

भारी उत्पात व अनिष्ट का योग। दान-जप श्रेयस्कर।

१८ शुभ

वरीयान (Variyana)

श्रेष्ठता, मान-सम्मान व उच्च पद प्राप्ति हेतु अनुकूल।

१९ मिश्रित

परिघ (Parigha)

शत्रु पर विजय हेतु उत्तम, परंतु अन्य शुभ कार्यों में त्याज्य।

२० शुभ

शिव (Shiva)

अत्यंत कल्याणकारी, सात्विक व धार्मिक अनुष्ठानों हेतु शुभ।

२१ शुभ

सिद्ध (Siddha)

सर्व मनोकामना सिद्ध करने वाला और कार्य निर्विघ्न बनाने वाला।

२२ शुभ

साध्य (Sadhya)

साधना, शिक्षण, दीक्षा और लक्ष्य की प्राप्ति में सहायक।

२३ शुभ

शुभ (Shubha)

धर्म, धन, विद्या और उत्तम संस्कार का मंगलकारी योग।

२४ शुभ

शुक्ल (Shukla)

निर्मलता, ज्ञान, शांति और आध्यात्मिक प्रकाश का प्रतीक।

२५ अत्यंत शुभ

ब्रह्म (Brahma)

ज्ञान, तपस्या, वेद-अध्ययन व परम शुभ फलदायक योग।

२६ शुभ

इन्द्र (Indra)

राजकीय कार्य, पदोन्नति, प्रभुत्व व नेतृत्व क्षमता विस्तार।

२७ अशुभ

वैधृति (Vaidhriti)

विनाशक व प्रतिकूल प्रभाव। शांति पाठ एवं व्रत उत्तम।

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७ चर करण (Movable)
०१ • चर शुभ

बव (Bava)

स्वामी: इंद्र देव • प्रतीक: सिंह

आरोग्य, शक्ति-संवर्धन, पौष्टिक व स्थायी कार्यों हेतु शुभ।

०२ • चर शुभ

बालव (Balava)

स्वामी: ब्रह्मा जी • प्रतीक: चीता

धार्मिक अनुष्ठान, अध्ययन, यज्ञ-हवन व विद्यारंभ हेतु श्रेष्ठ।

०३ • चर शुभ

कौलव (Kaulava)

स्वामी: मित्र (सूर्य) • प्रतीक: सुअर

मैत्री, प्रेम, संबंध विस्तार और साझेदारी कर्मों के लिए उत्तम।

०४ • चर शुभ

तैतिल (Taitila)

स्वामी: अर्यमा • प्रतीक: गधा

शिल्पकला, गृह निर्माण, वस्त्र-आभूषण धारण हेतु अनुकूल।

०५ • चर शुभ

गर (Gara)

स्वामी: पृथ्वी • प्रतीक: हाथी

कृषि कार्य, बीज बोना, भूमि क्रय और रोपण हेतु सर्वश्रेष्ठ।

०६ • चर शुभ

वणिज (Vanija)

स्वामी: श्री लक्ष्मी • प्रतीक: बैल

व्यापार, क्रय-विक्रय, लेन-देन और आर्थिक निवेश में शुभ।

०७ • भद्रा अशुभ

विष्टि / भद्रा (Vishti / Bhadra)

स्वामी: यमराज • प्रतीक: कुत्ता

अत्यंत अशुभ व विघातक। विवाह, यात्रा व मांगलिक कर्म सर्वथा वर्जित।

४ स्थिर करण (Fixed)
०८ • स्थिर मध्यम

शकुनि (Shakuni)

स्वामी: कलियुग • पक्ष: कृष्ण चतुर्दशी (द्वितीय अर्ध)

औषध सेवन, तंत्र-मंत्र सिद्धि एवं रोगोपचार हेतु फलदायी।

०९ • स्थिर मध्यम

चतुष्पद (Chatushpada)

स्वामी: वृषभ • पक्ष: अमावस्या (प्रथम अर्ध)

गोदान, पशुपालन, पितृ श्राद्ध व तर्पण हेतु विशेष फलदायी।

१० • स्थिर अशुभ

नाग (Naga)

स्वामी: सर्पराज • पक्ष: अमावस्या (द्वितीय अर्ध)

क्रूर व उग्र कर्म हेतु उपयुक्त; मांगलिक कार्यों में पूर्ण वर्जित।

११ • स्थिर शुभ

किंस्तुघ्न (Kimstughna)

स्वामी: वायु देव • पक्ष: शुक्ल प्रतिपदा (प्रथम अर्ध)

सभी प्रकार के मांगलिक कर्म, उत्सव और शुभ आरंभ हेतु अनुकूल।

षड् ऋतु (Six Sacred Seasons)

भारतीय काल गणना के अनुसार छह ऋतुओं का प्राकृतिक व आध्यात्मिक चक्र

ऋतु ०१ चैत्र - वैशाख

वसंत ऋतु (Vasanta)

Spring Season

ऋतुराज कही जाने वाली यह पावन ऋतु फूलों के खिलने, प्रफुल्लता व प्रकृति में नवचेतना और ऊर्जा के आगमन का प्रतीक है।

ऋतु ०२ ज्येष्ठ - आषाढ़

ग्रीष्म ऋतु (Grishma)

Summer Season

तीव्र सूर्य ताप और प्रचंड ग्रीष्म की ऋतु, जिसमें सूर्य की रश्मियों की तीव्रता व दिन की अवधि संपूर्ण वर्ष में सर्वाधिक होती है।

ऋतु ०३ श्रावण - भाद्रपद

वर्षा ऋतु (Varsha)

Monsoon Season

जीवनदायिनी मेघमालाओं की वर्षा ऋतु, जिसमें चातुर्मास का आरंभ होकर संतों व साधकों के लिए गहन आध्यात्मिक तपस्या का काल बनता है।

ऋतु ०४ आश्विन - कार्तिक

शरद ऋतु (Sharad)

Autumn Season

निर्मल आकाश, शीतल रातों व शरद पूर्णिमा की अमृत वर्षा वाली ऋतु; शारदीय नवरात्रि, विजयादशमी व महापर्व दीपोत्सव इसी में मनाए जाते हैं।

ऋतु ०५ मार्गशीर्ष - पौष

हेमंत ऋतु (Hemanta)

Pre-Winter Season

हल्की गुलाबी ठंड व स्निग्ध वातावरण की ऋतु, खेतों में नव अन्न की कटाई, आरोग्य संवर्धन व ईश्वरीय चिंतन का पावन समय।

ऋतु ०६ माघ - फाल्गुन

शिशिर ऋतु (Shishira)

Late Winter Season

शीत की चरम अवस्था एवं शिशिर स्नान का पुण्यदायी काल; इसके अंत में वसंत पंचमी, महाशिवरात्रि की पावन निशा व रंगोत्सव का आगमन होता है।

अष्ट दिशा एवं दिक्पाल (Eight Sacred Directions & Guardians)

वैदिक वास्तु एवं ब्रह्मांडीय संतुलन के अधिष्ठाता आठ प्रमुख दिक्पाल देव

पूर्व (East)

इन्द्र देव
देवराज इन्द्र

सूर्योदय की दिशा तथा नवीन शुभारंभ, ज्ञान, तेज, प्रकाश व संपूर्ण चेतना का दिव्य प्रतीक।

पश्चिम (West)

वरुण देव
जलाधिपति वरुण

जल तत्व के अधिष्ठाता, सूर्यास्त, संयम, शांति, धैर्य व जीवन की भावनात्मक गहराई की दिशा।

उत्तर (North)

कुबेर देव
धनाधिपति कुबेर

धन-धान्य, अक्षय समृद्धि, व्यापारिक वृद्धि व आध्यात्मिक शुभ ऊर्जा के सतत प्रवाह की दिशा।

दक्षिण (South)

यमराज
धर्मराज यम

सत्य, न्याय, धर्म मर्यादा, पूर्वज स्मृति, पितृ तर्पण व यम-नियम के कठोर अनुशासन से संबंधित दिशा।

ईशान (Northeast)

ईशान (शिव)
देवाधिदेव महादेव

पूजा-अर्चना, देव उपासना व उच्चतम सात्विक आध्यात्मिक ऊर्जा हेतु समस्त दिशाओं में सर्वाधिक पावन दिशा।

आग्नेय (Southeast)

अग्नि देव
पावक अग्नि

तेज, ताप, पाचन, रसोईघर तथा हविष्य-यज्ञ कर्मों के निष्पादन हेतु पूर्णतः उपयुक्त व शक्तिशाली कोण।

नैऋत्य (Southwest)

निर्रति देव
अधिपति निर्रति

पृथ्वी तत्व, भार वहन, स्थिरता, अभेद्यता व जीवन में संकल्प और आधार शक्ति को सुदृढ़ रखने की दिशा।

वायव्य (Northwest)

वायु देव
पवनदेव वायु

प्राणवायु, तीव्र गतिशीलता, व्यापारिक संप्रेषण, संबंध विस्तार व सकारात्मक परिवर्तन की दिशा।

द्वय अयन (Solar Solstices — Uttarayana & Dakshinayana)

सूर्य की छह-छह माह की उत्तराभिमुख व दक्षिणाभिमुख गति और उनका प्रभाव

देवयान • ०६ मास काल मकर संक्रांति से कर्क संक्रांति

उत्तरायण (Uttarayana)

Northward Solar Movement — Daytime of the Devas

मकर संक्रांति से कर्क संक्रांति (६ मास)। सूर्य उत्तर दिशा की ओर गति करते हैं। इसे देवताओं का एक दिन माना जाता है — प्रकाश, ऊर्जा, तप, साधना, यज्ञ-हवन, विवाह, उपनयन, गृह प्रवेश व सभी मांगलिक कार्यों हेतु महापुण्यदायी काल है।

पितृयान • ०६ मास काल कर्क संक्रांति से मकर संक्रांति

दक्षिणायन (Dakshinayana)

Southward Solar Movement — Night of the Devas

कर्क संक्रांति से मकर संक्रांति (६ मास)। सूर्य दक्षिण दिशा की ओर गति करते हैं। इसे देवताओं की रात्रि माना जाता है — अंतर्मुखी साधना, नियम-संयम, व्रत-उपवास, चातुर्मास महाअनुष्ठान और पितृ शांति एवं तर्पण कर्म हेतु विशेष प्रशस्त काल है।

पक्ष (Lunar Fortnights)

शुक्ल व कृष्ण — चंद्रमा की कलाओं से निर्मित दो पक्ष, जो हिन्दू कालचक्र का आधारभूत ढाँचा हैं।

उजाला पक्ष • १५ दिवस काल अमावस्या से पूर्णिमा

शुक्ल पक्ष (Shukla Paksha)

Waxing Phase — Fortnight of the Bright Moon

चंद्रमा के बढ़ने की अवधि — अमावस्या के अगले दिन (प्रतिपदा) से पूर्णिमा तक के पंद्रह दिन। इसे "उजाला पक्ष" भी कहा जाता है। यह पक्ष देव-कार्यों, विद्यारंभ, गृह प्रवेश एवं मांगलिक अनुष्ठानों हेतु अत्यंत प्रशस्त और फलदायी माना जाता है।

अंधियारा पक्ष • १५ दिवस काल पूर्णिमा से अमावस्या

कृष्ण पक्ष (Krishna Paksha)

Waning Phase — Fortnight of the Dark Moon

चंद्रमा के घटने की अवधि — पूर्णिमा के अगले दिन (प्रतिपदा) से अमावस्या तक के पंद्रह दिन। इसे "अंधियारा पक्ष" भी कहा जाता है। यह पक्ष पितृ-तर्पण, आत्म-चिंतन, संन्यास, तंत्र साधना एवं संयम-तपस्या हेतु विशेष फलदायी माना गया है।

काल एवं मुहूर्त (Auspicious & Inauspicious Periods)

दिन के शुभ व अशुभ कालखंड — ब्रह्म मुहूर्त से शयन काल तक, जो नित्य कर्म एवं मांगलिक कार्यों का मार्गदर्शन करते हैं।

पावन एवं शुभ मुहूर्त (Auspicious Muhurtas)

अत्यंत शुभ
१. ब्रह्म मुहूर्त (Brahma Muhurta) सूर्योदय से पूर्व (२ घटी)
काल समय: सूर्योदय से लगभग १ घंटा ३६ मिनट पूर्व

प्रशस्त कर्म: ईष्ट आराधना, ब्रह्म ज्ञान, ध्यान, योग, अध्ययन एवं आत्मचिंतन।

२. अभिजित मुहूर्त (Abhijit Muhurta) मध्याह्न काल
काल समय: लगभग ११:४५ से १२:३५ तक (स्थान भेद से)

प्रशस्त कर्म: सर्व कार्य सिद्धि; यात्रा, नवीन प्रतिष्ठान, व्यापार शुभारंभ (सर्वदोष निवारक)।

३. विजय मुहूर्त (Vijaya Muhurta) अपराह्न काल
काल समय: दोपहर २:०० से २:४५ के मध्य

प्रशस्त कर्म: शत्रु विजय, न्यायिक कार्य, मुकदमेबाजी व पराक्रम के कार्य।

४. गोधूलि मुहूर्त (Godhuli Muhurta) संध्या काल
काल समय: सूर्यास्त से १२ मिनट पूर्व व १२ मिनट पश्चात्

प्रशस्त कर्म: संध्या वंदन, दीप प्रज्वलन, शांति, गोसेवा, विवाह।

५. अमृत काल (Amrita Kala) नक्षत्र आधारित
काल समय: नक्षत्र अनुसार दैनिक परिवर्तनशील

प्रशस्त कर्म: मांगलिक कार्य, औषधि सेवन, प्रतिष्ठा, उत्सव।

वर्जित एवं अशुभ काल (Inauspicious Periods)

वर्जित कार्य
१. राहुकाल (Rahu Kala) दिन का ८वां भाग
काल समय: प्रतिदिन लगभग ९० मिनट

नियम एवं प्रभाव: नवीन कार्य, क्रय-विक्रय, यात्रा सर्वथा वर्जित।

२. यमगण्ड (Yamaganda) गुरु का प्रभाव
काल समय: दिन का विशेष पहर (गुरु के प्रभाव अनुसार)

नियम एवं प्रभाव: कार्य में विघ्न, असफलता, अनिष्ट की संभावना।

३. गुलिक काल (Gulika Kala) शनि पुत्र गुलिक
काल समय: शनि पुत्र गुलिक का प्रभाव काल

नियम एवं प्रभाव: स्थायी हानि व मरण तुल्य कष्ट हेतु शुभ कार्य वर्जित।

४. दुर्मुहूर्त (Durmuhurta) वार अनुसार त्याज्य
काल समय: प्रत्येक वार के विशिष्ट त्याज्य मुहूर्त

नियम एवं प्रभाव: शुभ अनुष्ठान, मांगलिक कार्य तथा यात्रा निषिद्ध।

५. वर्ज्यम् (Varjyam) विष नाड़ी काल
काल समय: नक्षत्र का विष नाड़ी काल (४ घटी)

नियम एवं प्रभाव: दोष पीड़ा, पीड़ा निवारणार्थ शुभ कार्य वर्जित।